Himachal pradesh jatoli shiv mandir. एशिया का सबसे ऊंचा शिवमंदिर।

Himachal pradesh jatoli shiv mandir. एशिया का सबसे ऊंचा शिवमंदिर।


Himachal pradesh jatoli shiv mandir. एशिया का सबसे ऊंचा शिवमंदिर। धार्मिक स्थल। भारत के मंदिर।


 हमारे देश मे रहस्यों की कमी नहीं है। खास कर के मंदिर से जुड़ी किंवदंती ओर रहस्यों सबसे ज्यादा देखे और सुने जाते है। है मंदिर के साथ अलग अलग कथा जुडी हुई है। जहा कहि भी मंदिर आई है वहा के लोगो से नई नई किंवदंती सुनने को मिलती है। वैसे तो हमारे देशवासियों को आस्था सर्वोत्तम है। तो हर मंदिर के साथ कुछ ना कुछ आस्था और किंवदंती जुड़ी हो यह आम वात है। 


आज हम हिमाचल प्रदेश की एक मंदिर की बात करने वाले है। जहां पत्थर को मारने से उस मेसे  डमरू का आवाज सुनने को मिलती है। हिमाचल प्रदेश की सोलन गांव में आया हुआ यह मंदिर ऐसा है कि वहां आसपास जितने पत्थर पड़े होते है उसे मारने से डमरु का आवाज सुनने को मिलति है।  यह एशिया का सबसे ऊंचा शिवमंदिर है। इस मंदिर का नाम जटोली शिव मंदिर है। उसे दक्षिण में द्रविड़ शैली में बनाया गया था। वैसे भी हिमाचल प्रदेश में आई हुई हर मंदिर के साथ एक रहस्य तो जुड़ी हुई होती ही है, ऐसा लोगो का मानना है। 


जटोली शिवमंदिर का निर्माण।

मंदिर का देखाव और बनावट बहोत ही सुंदर है। मंदिर की ऊंचाई 111 फुट है और उसके ऊपर 11 फुट का सुवर्ण कलस चढ़ाया हुआ है, जिसके कारण मंदिर की ऊंचाई 122 फुट लगती है। यहां के रहने वाले लोग कहते है कि एक समय भगवान शिव यहां आकर थोड़े समय के लिए रहे थे। देवी पार्वती भी अपबे दो पुत्रो के साथ यहां आए थे।  1950 के साल में स्वामी कृष्णानंद परमहंस नाम के ऋषी यहां रहने के लिए आये थे। एक बार उसके सपने में शिवजी आये थे। उन्होंने ने परमहंस को यहां मंदिर बनाने को कहा। इस लिए स्वामि कृष्णानंद परमहंस के मार्गदर्शन के अनुसार यहां जटोली शिव मंदिर बनाने का काम सुरु किया गया। 


जटोली मंदिर को बनाने में 3 दशक से भी ज्यादा समय लगा था। क्योंकि मंदिर भक्तों के दान से बनाया गया था। जब जब वहां आने वाले भक्तों से दान मिलता तब मंदिर का काम आगे बढ़ाया जाता। जटोली मंदिर में स्फटिक का शिव का शिवलिंग बना हुआ है। साथ ही साथ देवी पार्वती, कार्तिक, गणेश और हनुमान की मूर्ति भी बनाया हुआ है। मंदिर के आसपास बहोत छोटे बड़े पत्थर है। कहते है कि शिवजी जब ध्यान में बैठे थे तब बालक कार्तिक और गणेश उसके डमरू से खलते हुए इधर से उधर पत्थर के ऊपर घूम रहे थे। इस लिए पत्थर को मारने से उसमे से डमरू का आवाज आता हो ऐसा लगता है। वैज्ञानिक का मानना है कि मंदिर ऊँचाई पर होने के कारण ऐसा आवाज आता है। 


एक मान्यता ऐसी भी है की स्वामी कृष्णानंद यहां आये थे तब यहां के रहने वाले लोगो को पानी की समस्या का सामना करना पड़ता था। लोग पानी के लिए बहोत तकलीफो का सामना करते थे। लोगो की यह समस्या देखकर स्वामि ने समाधी धारण की ओर भगवान शिव की तपस्या की। शिवाजी की तपस्या के बाद उहनों ने त्रिशूल को घरती पर फेंका और वहां से पानी निकलने लगा। बस तभी से लोगो को पानी की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। इतना ही नहीं वहां के लोग पानी को पुण्यशाली मानते है। वहां के लोगो का यह मानना है कि यह पानी बीमारी मिटाने की क्षमता रखती है। यहां लोग अपनी मनोकामना पूरा करने के लिए यहां आते है। मनोकामना पूरा होने के बाद भी भक्त यहां दूध चढ़ाने आते है। 



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