हिंदी कहानी। Bachhon ki kahani.

हिंदी कहानी। Bachhon ki kahani.

 हिंदी कहानी। Bachhon ki kahani. 

बिजू का घर बिजनौर में था। वह बड़ा ही निर्धन था। बूढ़ी दादी और कुत्ता टामी ... इनके सिवाय संसार में उसका कोई नहीं था। बिजू ने दसवीं तक पढ़ाई कर ली थी , वो अब दिल्ली जाना चाहता था। उसने कनुवा दुकान में राशन लेते समय अखबार में एक ताजा खबर पढ़ी थी। दरअसल चाचा उसको हर रोज अखबार दिया करते थे कि यह लो बिजू इसको पढ़ा करो। उसने पढ़ा कि बारहवीं और उसके बाद कॉलेज की पूरी पढ़ाई एक ही जगह हो सकती है, वह भी मुफ्त में।


 उसने मन ही मन खुश होते हुए कहा कि वाह , घर जाकर दादी को बताता हूं कि एक सरकारी संस्थान बिलकुल मुफ्त में बारहवीं तथा कॉलेज की पढ़ाई करा रहा है। यही नहीं , शाम को एक घंटे साबुन और मोमबत्ती बनाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी और उसके पैसे भी मिलेंगे ताकि छात्र अपना जरूरी खर्च पूरा कर सकें। वो राशन का थैला लेकर वापस लौटने लगा तो उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। 


घर पहुंचा तो दादी बाहर ही धनिया, मिर्ची की क्यारी में कुदाल से निराई - गुड़ाई करती मिल गईं। दादी पूरे साठ साल की थीं। मगर रोज आठ घंटे बहुत मेहनत करती थीं। उसे गर्व था अपनी दादी पर। पहले तो उसने ' दादी दादी ' आवाज लगाई , फिर हांफते - हांफते दादी को उसने सारी बात बता दी। सुनकर दादी की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। वो तो खुद भी यही चाहती थीं कि बिजू पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए और अच्छी तरह कमाए - खाए।


 दादी तो गेहूं के दलिये से भी गुजारा कर लेती थी। मगर वो अकेला दिल्ली कैसे जाएगा, यह एक समस्या थी और दादी को मन ही मन कुछ घबराहट हो रही थी। यह बात राशन की दुकान वाले कनुवा चाचा को पता लगी और उन्होंने तो जैसे समस्या ही दूर कर दी। उनको अपनी दुकान के काम से दिल्ली जाना ही था वो बोले ' बिजू मेरे साथ जा सकता है। यह संस्थान तो बहुत जाना - पहचाना है , किसी भी प्रकार की फिक्र की जरूरत ही नहीं। अच्छा यह तो बहुत अच्छी बात हुई कहकर दादी ने ईश्वर को धन्यवाद कहा और उसके बाद कमर कसकर काम में जुट गईं।


दादी ने बिजू के जाने की सभी तैयारियां कर दीं , जैसे बिजू की दो पुरानी जींस को पूरा खोलकर दो शानदार मजबूत बैग सिल दिए । नीम और जामुन के पत्ते सुखाकर उसका दंत - मंजन बना दिया। पुदीने और धनिये के पत्ते सुखाकर चटपटाचूरन बना दिया। जंगल से बेल मंगवाकर उसको सुखाकरताकतकीटॉनिकबना दी। सूखा आंवला तो घर पर खूब सारा रखा ही था। अब दादी की सब तैयारी तो हो गई , मगर दादी के मन में कुछ खटक - सा रहा था। वो यह सोच रही थी कि दिल्ली की आबो हवा कहीं अपना असर दिखा दे तो बिजू आलसी और लापरवाह न बन जाए। कुछ तो करना चाहिए , वो सोच में डूबी रहीं। अब बिजू के दिल्ली जाने का समय भी आ गया।


दादी को अपना चेहरा हंसता हुआ रखना पड़ा , पर वो मन ही मन बैचेन । अपना मन संतुलित करके वह बिजू से बोली कि बिजू मेरे लाडले , अब तो तुम पांच - छह महीने बाद ही गांव वापस लौट पाओगे। मेरा एक काम कर देना , यह पन्नों वाली चित्रकारी की पुस्तक है , तुम रोज सुबह उगते हुए सूरज के चित्र इसमें बना देना , मैं देखना चाहती हूं। “ वाह दादी बिजू ने वह खाली पुस्तिका थाम ली वो तो चित्रकारी का बहुत शौकीन था। उसने एक सवाल पूछा , " मगर दादी उगता हुआ सूरज तो रोज एक - सा ही होता है फिर सौ चित्र क्यों ? " हां हां , बेटा यही तो कलाकारी है ... अलग अलग दृश्यों के सूर्योदय बनाना तुम।


पर दादी मैं समझा नहीं , अलग दृश्यों के सूर्योदय ? " उसने चौंककर पूछा तो दादी ने जवाब दिया- हां बिजू तुम सुबह कभी छत पर से , कभी किसी पार्क से , कभी किसी मैदान पर से , कभी किसी कॉलोनी के छोर से उगते सूरज को देखना और चित्र बना देना , बस एक घंटा लगेगा फिर तो पूरा दिन ही तुम्हारा है बेटा। " " ठीक है इसमें तो कोई मुश्किल नहीं बिल्कुल पक्का , हां हां दादी बिल्कुल जब लौटूंगा तो तुम देखना एक बढ़कर एक चित्र दादी। " दादी ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और खूब आशीष दिया। लगभग सात महीने बाद बिजू जब वापस लौटा तो दादी उसको देखती ही रह गई ल, वो बहुत स्वस्थ और खुश लग रहा था।


 दादी को सुकून मिला कि बिजू बिल्कुल भी आलसी नहीं बना , तभी तो वो चुस्त - दुरुस्त और लंबा हो गया था । बिजूने दादी से मिलकर उनको सौ नहीं , पूरी दो सौ पेंटिंग थमा दी , जो उसने दादी के दिए हुए उन कागजों पर कर रखी थीं । एक से बढ़कर एक चित्र थे। दादी ने सब चित्र गौर से देखे और राज खोल दिया कि मैं बस यही चाहती थी कि तुम सुबह सूरज उगने से पहले जाग जाओ और ताजी हवा से अपना दिन शुरू करो। " यह बात सुनकर तो बिजू हैरान रह गया।


दादी की इस युक्ति ने उसको एक नहीं, दो ईनाम भी दिलवाए थे। दादी ने उसके वो पुरस्कार देखे  बिजू ने दादी को बताया कि हर रोज समय पर जागने के लिए और सबसे अच्छे अनुशासन के लिए यह मैडल और सुंदर घड़ी उसे ईनाम में मिली हैं। दादी देखती रह गईं। वो निश्चिंत हो गईं कि बिजू अब न केवल अपने जीवन में सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगा , बल्कि खूब तरक्की भी करेगा।


इसे भी पढ़े। 

मनुष्य की कीमत क्या है।

किसी बात से डरो मत।

जिंदगी का मतलब क्या है ?

जैसा करोगे वैसा पाओगे।

Post a Comment

0 Comments