हालात कैसी भी हो हार मत मानो। Halat kesi bhi ho kabhi har mat mano.

हालात कैसी भी हो हार मत मानो। Halat kesi bhi ho kabhi har mat mano.

 हालात कैसी भी हो हार मत मानो। Halat kesi bhi ho kabhi har mat mano. 

ज़िन्दगी जीने के लिए इंसान हर उस तरीके को अपनाता हे जिसमे उसे अपनी खुसी नज़र आती हे। पर कई बार खुसी की तलाश में इंसान अपने अस्तित्व , संस्कार  व आदर्शो को भूल जाता हे ऐसी ही एक अनोखी दास्तान हे एक युवती की। जिसकी उम्र मात्र बीस साल की थी उसके माँ - बाप ने  बड़े प्यार से उसका नाम प्रियंका रखा था। अपनी घर की एकलौती संतान होने के कारण वह सबकी चहेती थी पर शायद सब का चहेता होना उसकी नियति में नहीं था। धीरे - धीरे  प्रियंका के माँ - बाप और घर के अन्य परिजन अकाल मृत्यु का शिकार हो गए , प्रियंका के जीवन में अब कुछ भी नहीं बचा था , उसके इस दर्द ने उसे अपने मूल विचार , संस्कार  से अलग कर दिया  प्रियंका दिन रात नशे के आदि होने लगी कभी रोती तो कभी पागलो की तरह पुरानी बातो को याद कर हसने लग जाती फिर अचानक प्रियंका की ज़िन्दगी में कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने  कल्पना भी नहीं की होगी।  प्रियंका अपने गम से उभर भी नहीं पाई होगी के उसकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हो गई जो उसकी ज़िन्दगी में मुसीबतो का पहाड़ लाने वाले थी। 


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वो कहते हे न " विनाश काल विपरीत बुद्धि "बस ऐसा ही कुछ प्रियंका के साथ होने वाला था , समय बीतने के साथ साथ प्रियंका उस औरत के साथ साथ काफी घुल मिल गई। प्रियंका को अपनी ज़िन्दगी की हर खुसी उस अधेड़ उम्र की महिला में नज़र आने लगी। पर शायद प्रियंका उस औरत के अंधे प्यार में अपने लक्ष्य और संस्कारो को भी भूलती जा रही थी और साथ साथ ये भी के दुनिया में लोग अक्सर हमसे अपने फायदे के लिए जुड़ते हे। अधेड़ उम्र की महिला ने प्रियंका को अपने प्यार में इतना बेबस कर दिया की वह सबकुछ भूलकर हर हालत मे उसके घर पर रहने लगी। कई बार दोनों के बीच मे अनबन हो जाती पर हर बार प्रियंका अपने स्वाभिमान को भूलकर उसे मनाने में लग जाती। समय के साथ साथ दोनों का प्यार बढ़ने लगा प्रियंका ने अपने आगे के भविष्य के बारे में सोचने के बजाय अपना पैसा , समय सबकुछ उस महिला और उसके परिवार के हवाले कर दिया। वह अपने माँ - बाप के दिए हुए संस्कारो को भी  भूल चुकी थी। प्रियंका भूल चुकी थी के जिस इंसान को अपना खुदा मानती थी उसे भी तो खुदा ने ही बनाया था और उसके ख्याब, चाहत शायद अलग भी हो सकते थे। अंत मे वही हुआ जो खुदा-ऐ  मंजूर था नाकि वो जो प्रियंका की नज़रो मे बसा था। उस अधेड़ महिला की असलियत धीरे - धीरे सामने आने लगी। 


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आये दिन हर बात पर उसका प्रियंका को ताना देना , उस पर हाथ चलाना , उसकी बेइज़्जती करना ये सब अब एक कम उम्र के अनाथ लड़की प्रियंका के लिए झेलना मुश्किल हो गया। शायद उसे यह एहसास हो चुका था  की उसका  इस्तेमाल किया जा रहा था। हुआ भी यही जैसे ही एक दिन प्रियंका की सेहत बेहद ख़राब हुई उस अधेड़ उम्र की महिला ने बड़ी ही बेइज़्ज़ती और उसे बेरुखी से अपने घर से निकाल दिया। इस बार शायद उसे भी बदतर हालात मे आ गई थी। और एक बार फिर अपने गम से उभरने के लिए नशे का सहारा लिया , उसने अपने आप को उन्ही अंधेरो मे पाया जहा वो पहले कभी थी , प्रियंका अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी, जब इसका पता प्रियंका के दोस्तों को चला तो उन्होंने उसे अस्पताल में भर्ती करवाया जहा उसका इलाज कई महीनो तक चला। जब उसने खुद को बेहतर पाया उसे अपनी गलतियों का अहसास हुआ , उसने ठान लिया के खुद को उस दलदल से निकाल कर खुद को बेहतर इंसान बनाएगी , अपने सपने पुरे करेगी जिसने भी उसका अपमान किया उसे निचा दिखाने की कोशिश की। वो इन सबका बदला अपने सपनो को पूरा कर के लेगी। इसके बाद उसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और डटी रही। अपनी बुलंद इरादों पर, द्रिड़ निश्चय के साथ प्रियंका ने सिविल सेवा अधिकारी की परीक्षा देकर एक सरकारी अफसर बन गई। 


सीख : हर वो व्यक्ति जो आपकी ज़िन्दगी में आये ज़रूरी नहीं की वो आपका सुभचिन्तक हो ,इंसान को ना पहचानने की गलती आपकी ज़िन्दगी बर्बाद भी कर सकती हे। अपने मित्र और शुभचिंतक सावधनीपूर्वक चुने।  


Auther :- Shivi


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